विसाले ख्वाजा र0 अ0

Khwaja Moinuddin Chishti History in HindiGarib Nawaz History in Hindi

विसाले ख्वाजा र0 अ0
(ख्वाजा साहब र0अ0 का देहान्त)

633 हिजरी शुरू होते ही ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 को मालूम हो गया कि यह आखिरी साल है। आपने मुरीदों को जरूरी हिदायतें और वसीयतें फरमाई। जिन लोगों को खिलाफत देना थी उन लोगों को कखलाफत से सरफराज फरमाया और साथ ही ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र0अ0 को अजमेर में बुलवाया।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 एक रोज अजमेर की जामा मस्जिद में तशरीफ फरमा थे। मुरीद और अकीदतमन्द अहबाब हाजिरे खिदमत थे। आप मलकुल मौत पर बातें कर रहे थे कि शेख अली सन्जरी से मुखातब हुए और उनसे ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकी र0 अ0 की खिलाफत का फरमान लिखवाया । कुतुब साहब हाजिरे खिदमत थे। हुजूर गरीब नवाज र0 अ0 ने अपना कुलाहे मुबारक कुतुब साहब के सर पर रखा, अपने हाथ से अमामा बांधा। खिरका-ए-अक्दम पहनाया, असाए मुबारक हाथ में दिया, मुसल्ला कलाम पाक और नालैन मुबारक देकर इर्शाद फरमाया-‘ ये नेमते मेरे बुजुर्गो से सिलसिला-ब-सिलासिला फकीर तक पहंची है,अब मेरा आखिरी वक्त आ पहुचा है। ये अमानतें तुम्हारे हवाले करता हंू इस अमानत का हक हर हालत में अदा करते रहना ताकि कियामत के दिन मुझे अपनु बुजुर्गो के सामने शर्मिन्दा न होना पड़े।

फिर और कई नसीहतें फरमायी और आपको रूख्सत किया। विसाल से कुछ दिन पहले आपने बड़े साहबजादे हजरत ख्वाजा सैयद फखरूद्दीन र0 अ0 को नसीहत फरमायी-‘ दुनिया की सभी चीजे मिटने वाली और फना होने वाली है। हर वक्त खुदा की पनाह व खुशनूदा मांगते रहना और किसी चीज पर भरोसा न रखना तक्लीफ और मुसीबत के वक्त सब्र व हिम्मत का दामन हाथ से न छोडना।‘

633 हिजरी में पांच और छः रजब की दर्मियानी रात को हमेशा की तरह इशा की नमाज के बाद आप अपने हुजरे में गए और अन्दर से दरवाजा बन्द करके यादे खुदा में लग गए। रात भर दरूद शरीफ और जिक्र की आवाज आती रही। सुबह होने से पहले यह आवाज आना बन्द हो गयी। सूरज निकलने के बाद भी दरवाजा नही खुला तो खदिम3ों ने दस्तक दी, उस पर भी कोई जवाब नही मिला तो परेशानी बढ गयी। आखिरकार मजबूर होकर दरवाजा तोड़कर अन्दर गए तो देखा कि आपकी रूहे मुबारक परवाज कर चुकी थी और आपकी नूरानी पेशानी पर सब्ज (हरा) और रोशन शब्दों में लिखा हुआ है-

‘हाजा हबीबल्लाहि मा-त फी हुब्बल्लाहि‘
(यह अल्लाह के हबीब थे, अल्लाह की मुहब्बत में वफात पाई)
‘इन्नाल्लिाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन‘

ख्वाजता गरीब नवाज र0 अ0 के इन्तिकाल पुर मलाल की खबर फौरन शहर के गली कूचों और कुर्ब व जवार में फैल गयी। लोग मुहब्बत के आंसू बहाते हुये अपने महबूब के जनाजे पर हजारों की तायदाद में जमा हो गए। आपके बड़े साहबजादे ख्वाजा फखरूद्दीन र0 अ0 ने नमाज जनाजा पढ़ाई। जिस हुजरे में आपको विसाल हुआ था उसी हुजरे में आपको दफन किया गया। उसी वक्त से आपका आस्ताना-ए-मुबारक पूरे हिन्दुस्तान का हारूनी मरकज बना हुआ है और इन्शाअल्लाह कियामत तक बना रहेगा। आपका उर्स मुबारक हर साल एक रजब से छः रजब तक बड़े इहतिमाम से होता है।

अख्लाक व आदात
(चरित व आदतें)

आप बडे़ ही नर्म दिल क्षुश मिजाज और मिलनसार थे। आपको गुस्सा बहुत कम आता था बल्कि आता ही नही था। जब किसी से बात करते तो मुस्करा देते, आपकी जिन्दगी बहुत सादा लेकिन दिलकश थी। जो कोई मिलने आता तो बहुत खुशी और गर्मजोशी से मिलते, इज्जत से बिठाते और उनके रंज व गम में शरीक होते।

सखावत आपके खानदान की खासियत थी। बचपन में ही आपने बाग व पवन चककी बेचकर कुल माल व दौलत खुदा की राह में फकीरों व अनाथों में बांट दी थी और बाद में जो कुछ नजराना तोहफे आया करते थे वह सब भी अल्लाह के नाम पर जरूरतमन्दों को दे दिया करते थे। आप बडे नर्म मिजाज थे। सलाम में हमेशा सबककत (पहला) किया करते थे, आदाबे शरीअत का हमेशा लिहाज रखते थे और सुन्नते नबवी सं0 अ0स0 का हर वक्त ध्यान रखते थे।

इबादत व रियाजत

आपका ज्यादातर वक्त इबादत और अल्लाह की याद में गुजरता था। कुरआन शरीफ पढ़ना आपको बहुत पसन्द था। एक दिन में दो-दो बार कुरआन शरीफ खत्म कर लिया करते थे। अक्सर (अधिकतर) सुबह के वुजू से इशा की नमाज पढ़ते थे। नमाज और रोजे के बड़े पाबन्द थे रात का ज्यादा हिस्सा नफ्ल पढ़ने में गुजरता था, अक्सर व बेशतर रातों में इशा के वुजू से आपने फज्र की नमाज अदा फरमाई। सारी उम्र में बहुत कम ऐसा हुआ है कि जिसमें आप रोजे से न रहे हों। अक्सर आप लगातार एक-एक हफ्ते तक रोजा रखते थे और जौ की सूखी रोटी से जो वजन में पांच मिसकाल से ज्यादा न होती थी इफ्तार (रोजा खोलना) किया करत थे लेकिन आंखो की तासीर का यह आलम था कि आपकी नजर जिस गुनाहगार पर पड़ती वह आपसे अकीदत (श्रद्वा) रखने लगता और फिर कभी गुनाह के पास न जाता।

अल्लाह के ध्यान में मग्न

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 पर अक्सर ऐसा होता था कि अललाह तआला की याद में इस तरह मग्न हो जाते कि और कुछ खबर न रहा करती थी। आखिरी वक्त में ध्यान व ज्ञान की कैफियत बेहद बढ़ गयी थी। नमाज के वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र0 अ0 या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र0 अ0 सामने खड़े होकर ऊंची आवाज में ‘सलात सलात‘ (नमाज नमाज) पुकारते, आप फिर भी होश में न आते तो कान में सलात पुकारते। इस पर भी आप न हिलते तो आपका शाना (कन्धा) मुबारक हिलाया जाता, उस वक्त आप आंख खोलकर इर्शाद फरमाते- ‘रसूलुल्लाह स0अ0स0 की शरीअत से छुटकारा नही सुब्हान अल्लाह कहां से आना पड़ता है।‘ और फिर वुजू करके नमाज पढ़ते। जब आप पर यह हालत ज्यादा होती तो हुजरे का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेते और यादे इलाही में मशगूल हो जाते। उस वक्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन या ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र0 अ0 हुजरे के दरवाजे पर पत्थर के टुकड़े डाल देते और खुद हुजरे के पीछे चले जाते। जिस वक्त हुजूर बाहर निकलते और आपकी नजरे जलाली उन टुकड़ो पर पड़ती तो वह जल कर खाक हो जाते।

सिमाअ
(अल्लाह व रसूल की कव्वाली में तारीफ)

सिमाअ आपकी रूही गिजा थी और आपको उससे लुत्फे खास हासिल होता था। आपको राग से बेहद दिलचस्पी थी। सिमाअ के वक्त आप बेखुदी व बेखबरी का आलम बहुत ज्यादा रहता था। अक्सर कई दिन तक मज्लिसे सिमाअ जारी रहा करती थी।

खिदमत-ए-खल्क
(जन सेवा)

एक रोज एक किसान आपकी खिदमत में हाजिर हुआ अर्ज किया कि हाकिम ने मेरा खेत जब्त कर लिया है और कहता है कि जब तक फरमाने शाही पेश नही करोगे खेत वापस नही मिलेंगे। सिर्फ यही मेरा गुजर बसर का जरिया था जिसका हाकिम ने बन्द कर दिया है इसलिए मेरी मदद करें और कुतुब साहब को एक सिफारशी खत लिखकर दिया जाए। कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र0 अ0 सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश के पीर है और जो कुछ इर्शाद फरमायेंगे बादशाह उसे कुबूल कर लेगा।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 ने यह सुनकर मुराकबें में सर झुका दिया और थोड़ी देर बाद सर उठाकर कहा-‘अगरचे मेरी सिफारिश से तेरा काम हो जायेगा लेकिन हक तआला ने मुझे तेरे इस काम के लिए मुकर्रर किया है और उसी वक्त किसान को साथ लेकर देहली रवाना हो गये।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 हमेशा अपनी आमद से पहले ख्वाजा कुतुबुदद्ीन बख्तियार काकी र0 अ0 को आगह कर दिया करते थे। इस बार आपने कोई इतिला (सूचना) नही दी। आप जब देहली के करीब पहुंचे तो एक शख्स ने आपको पहचान लिया और तुरन्त कुतुब साहब को खबर कर दी। कुतुब साहब ने बादशाह को सूचित किया और खुद पीर व मुर्शिद के स्वागत के लिए चल दिये।

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र0अ0 परेशान थे कि इस बार पीर व मुर्शिद ने अपनी आमद की खबर क्यो नही दी। मौका पाते ही ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 ने किसान की तरफ इशारा करके फरमाया-‘ इस गरीब के काम के लिए आया हॅू।‘ और कुल हाल बयान कर दिया। कुतुब साहब ने अर्ज किया-‘आपने इस कदर तक्लीफ उठाई, हालाकिं अगर आपका खादिम भी बादशाह से फरमाने आनी कह देता तो उस शख्स की मुराद पूरी हो जाती।

ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 ने फरमाया-‘ जिस वक्त यह शख्स मेरे पास आया बहुत गमगीन और मायूस था। ूैने ध्यान मग्न होकर दरबारे खुदावन्दी में अर्ज किया तो मुझे हुक्म हुआ कि इसके रंज व गम में शरीक होना इबादत के बराबर है। अगर मैं बजाये चलकर आने के वही से इस शख्स की सिफारिश लिख देता तो उस सवाबे अजीम से महरूम रहता जो हर कदम पर उसकी खुशी से मुझे हासिल हुइा है।‘ कुतुब साहब ने अर्ज‘ हुजूर आराम फरमायें और खुद सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश से किसान के हक में फरमान हासिल करके खिदमते आली में पेश कर दिया।

ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 के हौसले और इरादे
यकी मुहकम, अमल पैहम फातहे आलम,
जिहादे जिन्दगानी में यह हैं मर्दो की शमशीरें।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 ने हिन्दुस्तान में एक जबरजस्त रूहानी और समाजी इंतिकलाब को जनम दिया। छूत-छात के इस भयानक माहौल में इस्लाम का नजरिया-ए-तौहीद अमली रूप में पेश किया और बताया कि यह सिर्फ एक ख्याली चीज नही है, बल्कि जिन्दगी का एक ऐसा उसूल है जिसको मानने के बाद जात पात की सब ऊंच-नीच बेमायना हो जाती है। यह एक जबरजस्त दीनी और समाजी इंकिलाब का एलान था।

इन दिनों, अजमेर राजपूत साम्राज्य का मजबूत केन्द्र और हिन्दुओं का धार्मिक गढ़ था। दूर-दूर से हिन्दू अपनी धार्मिक रस्सों को पूरी करने के लिए वहां जमा होते थे। एक ऐसे जबरजस्त राजनैतिक और धार्मिक केन्द्र में रहने का फैसला, न सिर्फ ख्वाजा साह बर0 अ0 के पकके इरादे को बतात है, बल्कि उनकी गैर मामूली खुद एतमादी (आत्म विश्वास) का आईनादार है।

Ajmer SharifGarib NawazKhwaja Moinuddin Chishti Garib Nawaz History in Hindi