इमारत दरगाह शरीफ़

इमारत दरगाह शरीफ़

अजमेर शहर ऊंची पहाडि़यों के बीच आबाद है जैसे चारदीवारी में एक किला हो। इसके पचिश्म और दक्षिण पहलू से मिला हुआ तारागढ़ पहाड़ी का सिलसिला है, इसी पहाड़ी के दामन में हजरत ख्वाजा गरीब र0अ0 की दरगाह है जो एक बड़े क्षेत्रफल में चारदीवारी के अन्दर है।

दरगाह शरीफ के दक्षिण में झालरा, पूरब में गली लंगरखाना और मोहल्ला खदिमान, उत्तर में दरगाह बाजार और पश्चिम में वह रास्ता है जो त्रिपोलिया दरवाजे से होकर अन्दर कोट और तारा गढ़ को जाता है।

निजाम गेट

दरगाह शरीफ में दाखिल होने के चारों तरफ दरवाजे हैं जिनमें से सबसे ज्यादा ऊंचा और आलीशान दरवाजा दरगाह बाजार की तरफ से उसको निजाम गेट कहते हैं।

यह दरवाजा 1912 ई0 में बनना शुरू हुआ और तामीर का काम तीन साल तक जारी रहा। यह दरवाजा जनाब मीर उस्मान अली खां साबिक नवाज हैदराबाद का बनवाया हुआ है। इसलिए इसको उस्मानी दरवाजा भी कहते हैं। इसकी ऊंचाई सत्तर फुट और चैड़ाई मय दालानों के 24 फुट है, मेहराब की चैड़ाई सोलह फुट है। दरवाजे के ऊपर नक्कारखाना है।

कालिमा दरवाजा

उस्मानी दरवाजे से दरगाह शरीफ में दाखिल हो तो कुछ फासले पर एक पुरानी किस्म का दरवाजा आता है इसके ऊपर शाही जमाने का नुक्कारखाना है। इस दरवाजे को शाहजहां ने 1047 हिजरी में बनवाया। इस वजह से यह दरवाजा नक्कारखाना शहजहानी के नाम से मशहूर है। दरवाजे की मेहराबों पर साफ शब्दों में कलिमा तैयबा लिखा हुआ है जिसकी वहज से इसको कालिमा दरवाजा भी कहते हैं। दरवाजे के अन्दर-बाहर संगेमरमर का फर्श है।

कलिमा दरवाजे से आगे बढ़े तो एक सहन में दाखिल होते हैं जिसकी दायीं ओर शफाखाना और अकबरी मस्जिद की सीढि़यां हैं, सामने बुलन्द दरवाजा है।

अकबरी मस्जिद

यह मस्जिद अकबर के जमाने की यादगार है। शहजादा सलीम (जहांगीर) की पैदाइश के छः माह बाद अकबर बादशाह आस्ताना-ए-आलिया की जियारात के लिए अजमेर शरीफ आया, उसने मस्जिद की तामीर (निर्माण) का हुक्म दिया। यह मस्जिद सुर्ख पत्थरों से बनायी गई है। मस्जिद मय इसकी इमारतों के 140 फुट लम्बी और 140 फुट चैड़ी है। मेहराब 56 फुट ऊंचा है।

बुलन्द दरवाजा

यह दरवाजा सुल्तान महमूद खिलजी की यादगार है। इसकी बुलन्दी 85 फुट है अन्दर फर्श संगमरमर का है चूंकि दरगाह शरीफ की कुल इमारतों से यह दरवाजा ऊंचा है इसलिए इसको बुलन्द दरवाजा कहते हैं। 25 जुमादल आखिरी को इसी दरवाजे के ऊपर उर्स शरीफ का झन्डा लगाया जाता है।

सेहन चिराग

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 ने फरमाया- ‘कर्ज की अदायगी के लिए निम्न आयत को पांच बार हर नमाज में रोजाना इक्तालीस दिन तक पढ़े, इन्शाअल्लाह तआला कर्ज से बहुत जल्द निजात पाएगा।

बड़ी देग

सेहन चिराग में बुलन्द दरवाजे के दांयी तरफ बड़ी देग है। अकबर बादशाह ने अह्द (प्रण) किया था कि चित्तोड़ गढ़ की फत्ह के बाद सीधे अजमेर शरीफ हाजिर होकर एक बड़ी देग पेश करेगा। अतः उसको फत्ह हासिज हुई और सीधे अजमेर शरीफ पहुंचकर बड़ी देग चढ़ाई। इस देग का घेरा साढ़े बारह गज है और सममें सवा सौ मन चावल पक सकता है। यह देग 976 हिजरी में पेश की गई थी।
छोटी देग

यह देग सेहन चिराग में बुलंद दरवाजे के बांयी तरफ है। इसका सुल्तान नूरूद्दीन जहांगीर ने 1013 हिजरी में बनवाकर पेश किया, इसमें 80 मन चावल पक सकता है।

महफिल खाना

यह इमारत सेहन चिराग से पश्चिम की तरफ है। नवाब बशीरूद्दौला ने अपने फरजन्द रशीद नवाब मुईनुद्दौला की पैदाइश की खुशी में बनवाया था। नवाब ने दरबारे ख्वाजा में बेटे के लिए दुआ मांगी थी। अल्लाह तआला ने उन्हें अस्सी साल की उम्र में बेटा अता फरमाया। इसी खुशी और मन्नत की अदायगी में उन्होंने यह इमारत बनवायी। इसकी तामीर का काम 1306 हिजरी में शुरू हुआ और 1309 हिजरी में यह इमारत बनकर तैयार हुई, जिसकी लम्बर 46 फुट और चैड़ाई भी 46 फुट है, यह इमारत चैकोर है। उर्स शरीफ के दिनों में मज्लिस सिमाअ (कव्वाली) का बन्दोबस्त इसी इमारत में रहता है, इसलिये इसको महफिल खाना कहते हैं।

खानकाह

यह इमारत महफिल खाने से मिली हुई पश्चिम की तरफ है और इसमें दाखिल होने के लिए महफिल खाने के शुमाली (उत्तरी) गोशे में एक दरवाजा है। आजकल इस इमारत में यतीम खाना है।

लंगर खाना

सेहन चिराग के पूरब में हुजरों की लाइन के बीच एक फाटक है, इस फाटक से अन्दर दाखिल होने पर एक बड़ा दालान है जिसका एक फाटक गली लंगर खाना में खुलता है। दालान के अन्दर लोहे के दो बड़े-बड़े कढाव हैं जिसमें सुबह शाम नमकीन दलिया पकाकर गरीबों में बांटा जाता है। यह लंगरखाना अकबर बादशाह ने गरीबों के लिए बनवाया था।

अहाता-ए-चमेली

सेहन चिराग से आगे बढ़ने पर हुजरों की लाइन के बीच दो बड़े-बड़े दरवाजे हैं, जो दरवाजा पूरब की तरफ है, उससे आगे बढ़ने पर अहाता-ए-आस्ताने आलिया में दाखिल होते हैं और गुम्बद शरीफ बिल्कुल सामने नजर आता है। बांयी तरफ संगमरमर की बनी हुई एक खूबसूरत मगर छोटी-सी मस्जिद है जिसको औलिया मस्जिद कहते हैं, दांयी तरफ सन्दली मस्जिद है जिसके उत्तरी सिरे से मिला हुआ अहाता-ए-चमेली है जिसमें पाक मजारें हैं। इन मजारों और उनकी दीवारों पर चमेली के पौधे छाए हुए हैं। मशहूर है कि यह मजारे ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 की बीवियों की है।

मस्जिद सन्दल खाना

इस मस्जिद का बयान अहाता-ए-चमेली के साथ हो चुका है। यह मस्जिद सुल्तान महमूद खिलजी की बनवाई हुई है। जहांगीर के जमाने में मस्जिद खस्ता व शिकस्ता (टूटी-फूटी) हो चुकी थी। जहांगीर बादशाह ने चार दर बढ़ा कर नयी बनवाई। शहनशाह औरंगजेब ने इसकी मरम्मत कराई, इस वजह से यह मस्जिद तीनों बादशाहों के नामों से मशहूर है।

उर्स शरीफ के दिनों में एक रजब से नौ रजब तक मजार अक्दस पर पेश करने के लिए सन्दल की घिसाई इसी मस्जिद में होती है जिसकी वहज से यह सन्दली मस्जिद के नाम से मशहूर हो गयी है।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 के मजारे अक्दस से सुबह व शाम जो फूल उतरते हैं वह इसी मस्जिद के एक गहरे ताक में कुछ देर के लिए रखे जाते हैं इस वजह से इस मस्जिद को मस्जिद फूल खाना भी कहते हैं।

औलिया मस्जिद

यह मजिस्द अहाता चमेली और मस्जिद सन्दल खाना से कुछ कदम के फासले पर पूरब की तरफ बनी हुई है। यह मस्जिद उस जगह पर बनाई गयी है जहां हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 नमाज पढ़ा करते थे।

शाहजहानी मस्जिद

यह मस्जिद मजारे अक्दम से पश्चिम की तरफ बनी हुई है। बहुत उम्दा सफेद संगमरमर से बनाई गई है। यह आलीशान मस्जिद शाहजहां बादशाह के हुक्म से बनवाई गयी थी। जुमे की नमाज इस मस्जिद मे बड़ी शान से होती है। इसको जामा शाहजहानी भी कहते हैं। इसकी लम्बाई 97 गज और चैड़ाई 27 गज है। मस्जिद का सेहन बहुत बड़ा है। मजारे अक्दम का जन्नती दरवाजा मस्जिद के मेहराब से बिल्कुल सामने नजर आता है। जुमा की नमाज इस मस्जिद में बड़ी शान से होती है। शाही जमाने से ही यह कायदा है कि जुमे की नमाज के लिए चार बार तोपें चलाई जाती है। पहली खुत्बा होने से पांच मिनट पहले, दूसरी खुत्बे के वक्त, तीसरी इकामत के वक्त और चैथी सलाम के वक्त।

बेगमी दालान

गुम्बद शरीफ का सदर दरवाजा पूरब की तरफ है। इस दरवाजे के आगे एक बहुत खूबसूरत और आलीशान दालान है जो तीन तरफ खुलता है। यह दालान 1053 हिजरी में शहजादी जहान आरा ने बनवाया था। इसलिए इसको बेगमी दालान कहते हैं।

रौजा-ए-मुनव्वरा

रौजा-ए-मुनव्वरा और गुम्बद शरीफ का काम सुल्तान महमूद खिलजी के जमाने में शुरू हुआ, मगर कई इतिहासकार लिखते हैं कि रौजा-ए-मुनव्वर और गुम्बद शरीफ ख्वाजा हुसैन नागौरी र0अ0 ने बनवाई है। गुम्बद का अन्दरूनी हिस्सा पत्थर का है जिनको चूने से जोडा गया है। गुम्बद के बाहर का हिस्सा सफेद है जिस पर चूने का प्लास्टर चढ़ा हुआ है।

गुम्बद के अन्दरूनी हिस्से में सुनहरी व रंगीन नक्श व निगार बने हुए हैं। सफेद गुम्बद पर सोने का बहुत बड़ा ताज लगा है इसको नवाब कलब अली खां (रामपुर) क भाई हैदर अली खां मरहूम ने नज्र किया था। मजारे अक्दस हमेशा मखमल के कब्र-पोशों से ढका रहता है उन पर ताजा गुलाब के फूलों की चादरें चढ़ी रहती है। छप्पर-खट के बीच में सुनहरा कटेहरा लगा है जो शहनशाह जहांगीर ने बनवाकर चढ़ाया था।

गुम्मद शरीफ के अन्दर रोशनी

मग्रिब की नमाज से करीब बीस मिनट पहले पुराने रिवाज के अनुसार रौजा-ए-मुनव्वरा में बिजली की सभी रोशनी बन्द कर दी जाती है और खालिस मोम की बनी हुई मोमबत्तियां रोशन की जाती हैं, उन बत्तियों को रोशन करते वक्त नीचे लिखे शेर पढ़े जाते हैं। अन्दरूने गुम्बद के चारों तरफ चैखटों पर आईनें लगे हैं और यह शेर उनपर सुनहरी शब्दों में लिखे हुए हैं।

ख्वाज-ए-ख्वाजगा मुईनुद्दीन (ख्वाजाओं के ख्वाजा मुईनुद्दीन है) अशरफे औलिया-ए-रूए जमीं (जमीन के बड़े औलियाओं में सब से बड़े हैं)

आफ्ताबे सपहरे कौनों मकां (आप कौन व मकां के सूरज हैं) बादशाहे शरीरे मुल्के यकीं (आप अकीदत के देश की राजगद्दी के बादशाह हैं।)

दर जमाल व ऊ चे सुखन (आपके जमाल और कमाल का मुकाबला काई नहीं कर सकता) ईं मुबैय्यन बुवद बहिस्ने हसीं (यह रोशन दलील मजबूत किले के समान है)

मतलऐ दर सिफाते ऊ गुफतम आपकी तारीफ में एक मतला पेश कर रहा हूं दर दबारत बुवद चू दुर्रे समीं (जिसकी इबारत अनमोल मोती है)

ऐ दरत किब्ला गाहे अहले यकीं (अकीदत मन्दो के लिए आपका दर किब्ला है) बर दरत मेहरो माह सुदा जबीं आपके दर पर चांद और सूरज परेशानी रगड़ते हैं)

रूबे बर दरगहत हमीं सायन्द (आपकी चैखट पर परेशानी रगड़ते हैं) सद हजारां मलिक चू खुसरूए चीं चीन के राजा जैसे सैकड़ों बादशाह)

खादिमाने दरत हमा रिजवा (आपके दरबार में खादिम गोया जन्नत के पहरेदार हैं।) दर सफा रोजाअत चूं खुल्दे बरीं (आपकी मजार मुबारक खुल्दे बरीं की तरह है)

जर्रा-ए-खाके ऊ अबीर सरिश्त (आपके मजार मुबारक की खाक का हर जर्रा अबीर की तरह है) कतरा-ए-आबे ऊ चू माए मोई (आपके दर के पानी की एक-एक बूंद जगमगाते मोती की तरह है)

इलाही ता बुवद खुर्शीद व माही (या इलाही जब तक चांद सूरज कामय है) चिरागे चिश्तियां रा रोशनाई चिश्तियों के चिराग को रोशन रख)

चिल्ला बाबा फरीद गंज शकर (र0अ0)

यह वह जगह है जहां बाबा फरीद्दीन गंज शकर र0अ0 ने चिल्ला किया था। यह जगह मस्जिद सन्दल खाना के पीछे जमीन के अन्दर है। खास मस्जिद सनदल खाना के नीचे तहखाने में है, नीचे उतरने के लिए सीढ़ी बनी हुई है। इसका दरवाजा साल भर बन्द रहता है और मुहर्रम की 5 तारीख को खुलता है। उस दिन जायरीनों की लाइन लग जाती है और दूर-दूर के लोग हाजिर होकर जियारत करते हैं।

मजार हजरत ख्वाजा फखरूद्दीन गुरदेजी र0अ0

आप और आपकी बीवी के मजार तोशा खाने में हैं, जो बेगमी दालान से मिला हुआ है और उसका दरवाजा रौजा-ए-मुनव्वरा के अन्दरूनी हिस्से में खुलता है। आप हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 के करीबी रिश्तेदार, पीर भाई और मुरीद थे। आपकी औलाद खुद्दाम सैयदजादगान कहलाती है जिनको अन्दरूने गुम्बद ख्दिमत का हक हासिल है। गुम्बद शरीफ, मजार अक्दस और उसका सभी सामान हजरात के कब्जे में रहता है। यही खिदमत करते हैं, फूल और सन्दल चढ़ाते हैं और जायरीन को सलाम कराते हैं, गिलाफो और चादरों का चढ़ाना इन्हीं के जिम्मे है।

25 और 26 रजब को आपका उर्स बड़ी धूमधाम से होता है।

चार यार

जामा मस्जिद शाहजहांनी के दक्षिण दीवार के साथ ही एक छोटा सा दरवाजा है, जो पश्चिम की तरफ खुलता है। इस दरवाजे के बाहर एक बड़ा कब्रिस्तान है। यह कब्रिस्तान झालरा की दीवार से लेकर जामा मस्जिद के पीछे दूर तक फैला हुआ है। इस कब्रिस्तान में बड़े-बड़े आलिमों, फाजिलों, सूफियों, फकीरों, और औलिया-अल्लाह के मजारात हैं। मौलाना शम्सुद्दीन साबह र0अ0 भी इसी जगह दफन हैं और मदफून है। जिनका विसाल मज्लिसे सिमआ में हुआ था। कहा जाता हे कि इसी कब्रिस्तान में चार मजार उन बुजुर्गों के भी हैं जो हुजूर गरीब नवाज र0अ0 के साथ तशरीफ लाये थे। इसी वजह से यह जगह चार यार के नाम से मशहूर है।

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