शादियां और औलादें

Khwaja Moinuddin Chishti History in HindiGarib Nawaz History in Hindi

शादियां और औलादें

 

biwi shab ke dargah

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 का बचपन मुसीबतों और तकलीफों में गुजरा जवानी इल्म हासिल करने, अल्लाह की इबादत और फकीरी में बिता दी अब जबकि आपकी उम्र शरीफ करीब उनसठ साल की हो गयी और अजमेर शरीफ आपका हमेशा का ठिकाना बन गया। इस्लाम की तब्लीग का काम अपने परे जोर-शोर परथा तो एक रोज ख्वाब में आपको हजरे सरकारे दो आलम स0अ0स0 का दीदार हुआ, सरकारे दो आलमस0अ0स0 ने ईशाद फरमाया-‘मुईनुद्दीन! अल्लाह के हुक्म को पूरा किया, क्या वजह है कि मेरी सुन्नत पर अमल नही किया।‘ इस ख्वाब के बाद हुजूर गरीब नाज र0 अ0 ने एक के बाद एक दो शादियां की।

उन दिनों अजमेर शरीफ में एक-बा-खुदा बुजुर्ग सैयद वलीहुद्दीन मशहदी र0 अ0 रहते थे। एक दिन हजरत सैयद वजीहुद्दीन मशहदी र0 अ0 ने इमाम जाफर सादिक र0 अ0 को ख्वाब में देख कि फरमा रहे है ‘ऐ फरजन्द वजीहुद्दीन! इर्शादे हुजूर सरवरे दो आलम स0अ0स0 है कि अपनी लड़की ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के निकाह में दे दो क्योकि वह अल्लाह वाल और रसूल स0अ0स0 के चाहने वालों में है।

जिस वक्त सैयद साहब ख्वाजा से जागे तो उनको बड़ी खुशी हुई। हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0अ0 की खिदमत में हाजिर होकर अपना ख्वाब बयान किया। ख्वाजा साहब र0 अ0 ने फरमाया कि अगरचे मेरी उम्र आखिर हुई और जब निकाह की जरूरत नही मगर हुजूरे सरकारे दो आलम स0अ0स0 के इर्शाद और फरमाने इमाम आली मुकाम का बजा लाना जरूरी है इसलिए बात मुझे मन्जूर है। यीसुनकर सैयद साहब बहुत खुश हुए और हुजूर गरीब नवाज र0अ0 के साथ अपनी दुख्तर (बेटी) का निकाह कर दिया। उनकी बीवी का नाम अस्मत था।

हुजूर गरीब नवाज उर0अ0 ने दूसरा निकाह भी किया है जो एक राजा की लड़की से हुआ जिन्होने बपनी खुशी से इसलाम कुबूल कर लिया था । उन बीबी साहिबा का इस्लामी नाम अमतुल्लाह था।

दोना बीवियों से तीन साहबजादे और साहबजादी कुल चार औलादें हुजूर गरीब नवाज र0 अ0 के हुई जिनके नाम ये है।

(1) हजरत ख्वाजा फखरूद्दीन र0अ0
(2) हजरत ख्वाजा जियाउद्दीन अबू सईद र0अ0
(3) हजरत ख्वाजा हुसारमुद्दीन र0 अ0
(4) बीबी हाफिज जमाल र0 अ0

हजरत ख्वाजा फखरूद्दीन र0 अ0

आप हुजूर गरीब नवाज र0 अ0 के सबसे बड़े साहबजादे है, माडल कस्बे में खेती करके अपना गुजर-बसर करत थे। आप बहुत बड़े बा-कमाल बुजुर्ग और जबरजस्त आमिल थे। हुजूर गरीब नवाज र0 अ0 के विसाल (देहान्त) के बीस साल बाद आपने कस्वा सरवाड़ में जो अजमेर शरीफ से चालीस मील दूर है सुकूनत इख्तियार की मजारे पाक वही है जो एक तालाब के किनारे बहुत खूबसूरत जगह पर है। हर साल माहे शाबान की तीन से छः तक आपका उर्स बड़े धूमधाम से सरवाड़ में होता है। आपके पांच साहबजादे थे जिनमें हजरत ख्वाजा हुसामुद्दीन जिगर सोख्ता र0 अ0 बड़े बाकमाल और खुदा शनास बुजुर्ग थे। आपका मजार मुबारक साम्मर शरीफ में है हर साल माहे रजब की तेरह और चैदह तारीख को आपका उर्स होता है।

सरकार गरीब नवाज र0अ0 को हजरत ख्वाजा फखरूद्दीन र0अ0 से बेहद मुहब्बत थी। आप खेती करके अपना गुजारा किया करते थे। एक बार हाकिम ने आपके मक्बूजा आराजी (खेती की जमीन ) पर एतराज किया। हुजूर गरीब नवाज र0अ0 खुद देलही जाकर सुल्तान शम्सुद्दीन अलतमश से फरमाने शाही हासिल करके वापस अजमेर शरीफ आ गये।

हजरत ख्वाजा जियाउद्दीन अबू सईद र0 अ0

आप ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 के छोटे साहबजादे है बहुत परहेजगार और इबादतगुजार बुजुर्ग थे। आपने पचास साल की उम्र में वफात पाई। मजार मुबारक हुदूदे दरगाह शरीफ अजमेर में झालरा से लगा हुआ साया घाट के चबूतरे पर है। आपका उर्स हर साल जिलहिज की तेरहवी ताीख को होता है।

हजरत ख्वाजा हुसामुद्दीन र0अ0

आप हुजूर नवाज र0 अ0 के मंझले साहबजादे है। आप बहुत बड़े आलिम और बाकमाल बुजुर्ग थे। आपको हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 की रूहे मुबारक से निसबत हासिल थी। आपने इबादतगुजारी में सख्त मेहनत और रियाजत की। पैंतालीस साल की उम्र में आप दुनिया की नजरों से गायब होकर अबदालों में शामिल हो गये।

हजरत बीबी हाफिज जमाल र0अ0

आप सरकार गरीब नवाज र0 अ0 इकलौती साहबजादी है। बहुत बड़ी आलिम, इबादतगुजार औश्र पाक खातून थी। हुजूर गरीब नवाज र0 अ0 ने आपको खिरका खिलाफत अता फरमाया। बहुत सी औरतों ने आपके वसीले से कुर्बे इलाही का दर्जा हासिल किया। हजरत शेख रजीयुद्दीन र0 अ0 के साथ आपका निकाह हुआ, जो काजी हमीदुद्दीन नागौरी र0 अ के साहबजादे थे। साहबजादी साहिबा ने बहुत सख्त इबादतें और रियाजतें की है। आपका मजार मुबारक हुजूरे गरीब नवाज र0 अ0 के पाईन में है।

यहां यह बयान करना दिलचस्पी से खाली न होगा कि एक रोज हुजूर गरीब नवाज र0अ0 ने खास लोगों और अकीदतमन्दों की मज्लिस में इर्शाद फरमाया-मेरी पहली हालत यह थी कि जो कुछ दिल में ख्वाहिश होती थी वह तुरन्त पूरी हो जाती थी लेकिन जब से औलाद हुई है दुआ के बगैर पूरी नही होती हजरत ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी र0 अ0 ने जो इस मज्लिस में मौजूद थे अर्ज किया -हजरत ! होना भी ऐसा ही चाहिये था क्योकि हजरत ईसा अ0स0 जब पैदा नही हुए थे तो हजरत मरयम को जननत के मेवे बिना दुआ के आते थे लेकिन हजरत ईसा र0 अ0 की पैदाइश के बाद हजरत मरयम को हुक्म हुआ कि पेड़ से तोड़कर खुरमा खओ। बिना दुआ और हरकत कुछ न मिलता था। यह सुनकर सरकार गरीब नवाज र0 अ0 बहुत खुश हुए।

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