तलाशे हक

Khwaja Moinuddin Chishti History in HindiGarib Nawaz History in Hindi

तलाशे हक

शेख इब्राहीम कन्दोजी र0 अ0 ने जब से हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र0 अ0 को इश्के इलाही की झलक दिखाई थी उसी वक्त से आपका दिन बेकरार था। और जब तालीम की हवा ने इश्क की आग का भझ़का दिया। इस तरह आपने एक दिन समरकन्द को भी छोड़ा और अल्लाह का नाम लेकर मग्रिब (पश्चिम) की जानिब रवाना हो गये। मग्रिब की सरजमीन बड़े-बड़े आरिफाने हक के मजारों से भरी पड़ी थी। और बड़े-बड़े खुदा रसीदा बुजुर्ग उस सरजमीन पर मौजूद थे, जहां कदम-कदम पर फैज के दरिया जारी थे। समरकन्द से एक रास्तर दक्षिण की तरफ बल्ख को जाता है। आप इसी रास्ते पर कामिल पीर ( योग्य गुरू) की तलाश में चल पड़े मगर इस तमाम सफर में कोई पीरे कामिल न मिला और आप बराबर चलते रहे जैसे कोई गैबी कशिश आपको खींचते लिए जा रही हो। नेशापुर से कुद ही दूर चले थे कि कसबा हारून में पहंुच गये।

ख्वाजा साहब र0 अ0 पीरे कामील की खिदमत में

कस्वा हारून एक छोटा-सा कस्बा थो लेकिन शाने खुदावन्दी तो देखो कि इस छोटे से कस्बे पर अल्लाह की रहमत बरस रही थी, यानी इन दिनो वहां हजरत ख्वाजा शेख उस्मान कस्वा खैर व बरकत से मामूर (भरा) था।

हजरत शेख उस्मान हारूनी र0 अ0 महान औलियाओं में से थे और आपको फैज व बरकत की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी, हाजतमन्द और अल्लाह के चाहने वाले अपनी मुरादों की झाोलियां भर-भर कर ले जाते थे।

हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 के इश्क का जज्बा आखिकार आपको मंजिल पर ले आया, यानी आप कस्वा-ए-हारून में दाखिल हो गये। उस वक्त आपकी खुशी की इन्तिहा न रही क्योकि आपने अब चश्मा-ए-आबे बका को पा लिया था यानी पीरे कामिल को पा लिया था।

हमारे ख्वाजा र0 अ0 दूर से सफर करते हुए हारून पहुंचे थे इसलिए आपका जिस्म मुबारक गर्द आलूद (धूल युक्त) हो गया था और लिबास गुबार में अटा हुआ थो। आप बेकरा जरूर थे मगर चेहरे पर ताजगी और संजीदगी (गंभीरता) दिखाई देती थी। हजरत गरीब नवाज र0 अ0 ने हजरत ख्वाजा शेख उस्मान हारूनी र0 अ0 के दस्ते हम परस्त पर बैअत की और ख्वाजा उस्मान हारूनी र0 अ0 ने आपको अपने शागिर्दो में शामिल कर लिया।

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 अ0 के मुरीद होने का वाकिया खुद आपके शब्दों में यहां पेश किया जाता है।

मै एक ऐसी साहबत में जिसमें जलीलुल कद्र बुजुर्ग मौजूद थे बहुत अदब से हाजिर हुआ और सरे नियाज जमीने अदब पर झुका दिया।

हुजूर ने हुक्म फरमाया-
‘दो रक्अम नमाज अदा करों।‘
मैने हुक्म का पालन किया फिर हुक्म हुआ।
‘किबला रूख बैठ जाओ।‘
मै अदब से किबला रूख बैठ गया।
फिर इर्शाद फरमाया-‘सूर बकर की तिलावत करो।‘
मैने अदब के साथ तिलावत की फिर हुक्म हुआ- -साठ बार सुब्हानललाह पढ़ो। मैने पढा। फिर हुजूरे वाला ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और आसमान की तरफ नजर उठाकर देखा और जबान मुबारक से यह इर्शाद फरमाया- मैनं तुझे खुदा तक पहुंचा दिया।
इन सभी बातों के बाद हजरत शेख उस्मान हारूनी र0 अ0 ने एक खास किस्म की तुर्की टोपर मेरे सर पर रखी जो कुलाह चहार तुर्की कहलाती है और जुब्बा (चोगा) मुबारक मुझे पहनाया। फिर फरमाया-‘बैठ जाओ।‘
मै फौरने बैठ गया। अब फिर हुक्म हुआ।
‘हजार बार सूाः इख्लास पढो।‘
जब में इससे फारिंग हुआ तो फरमाया-हमारे मशाइख के यहां सिर्फ एक दिन रात की इबादत है, इसलिए जाओ और एक दिन रात बराबर इबादत करो।‘
ये हुक्म सुनकर मैने एक दिन रात पूरी इबादते इलाही और नमाल में गुजार दी। दूसरे दिन खिदमत में हाजिर होकर कदम-बोसी की दौलत हासिल की और हुक्म के मुताबिक बैठ गया। इर्शाद फरमाया- इधर देखा।‘ (आसमान की तरफ इशारा करके) मैंन आसमान की तरफ नजर उठाई। आपने पूछा- कहां तक दिखता है ?‘
मैने जवाब दिया, ‘अर्शे मोअल्ला तक ।‘
फिर इर्शाद हुआ, ‘नीचे देखो।‘
मेने नीेच देखा तो फिर वही फरमाया-कहां तक दिखता है?
मैने जवाब दिया, ‘तहतुस्सरा (पाताल) तक।‘
फिर हुक्म हुआ- हजार बार सूरः इख्लास पढो।‘
मैने हुक्म का पालन किया तो हजरत ने फिर इर्शाद फरमाया-‘आसमान की तरफ देखो।‘
मैने देखा और अर्ज किया-‘हिजाबे अजमत तक साफ नजर आ रहा है।‘
फरमाया-‘आंखे बन्द करो।‘ मैने आंखे बन्द कर ली। फिर हुक्म दिया- ‘खोल दो।‘
मैने आंखे खोल दी।‘
इसके बाद आपने अपनी दो उंगलियां मेरे सामने की और पूछा- ‘क्या दिखाई देता है ?
मैने जवाब दिया- ‘अट्ठारह हजार आलम मेरी आंखो के सामने है।‘
तब मेरी जबान से ये जुल्मे (वाक्य) निकले तो आपने इर्शाद फरमाया-‘बस, अब तेरा काम पूरा हो गया।‘
बाद में एक ईट की तरफ जो सामने पड़ी थी, इशारा करके फरमाया-‘इसको उठा लो।‘
मैने उठाया तो उसके नीचे से कुछ दीनार निकले, जिनके बारे में हुक्म हुआ-‘इन्हे ले जा, और फकीरों व गरीबो में बांट दे।‘
मैने हुक्म का पालन किया और फिर खिदमत में हाजिर हुआ।
इर्शाद हुआ-‘कुछ दिन हमारी खिदमत में रहो।‘
मैने अर्ज किया-‘हाजिर हंू।‘

Ajmer SharifGarib NawazKhwaja Moinuddin Chishti Garib Nawaz History in Hindi