उलूमे जाहीरी की तकमील

Khwaja Moinuddin Chishti History in HindiGarib Nawaz History in Hindi

उलूमे जाहीरी की तकमील

खदा की याद क्योकिं इल्म के बगैर नामुमकिल है, इसलिए हमारे ख्वाजा ने सबसे पहले इल्म हासिल करने की तरफ ध्यान दिया ताकि अमल में कमी और खराबी न रहे। आपने अपने वतन को छोड़ दिया और इल्म की तलाश में निकल पड़े चंकि तातरियों ने खुरासान के ज्यादातर दीनी मदरसों को नष्ट कर दिया था, इसलिए हमारे ख्वाजा को इल्म की पयास बुझााने के लिए दूर-दूर का सफर करना पड़ा। कठिन और दुश्वार रास्तों, नदियों और पहाड़ों और घने जंगलों को पार करते हुए हर किस्म की मुसरबतों और तक्लीफों को सहते हुए आप बराबर सफर करते रहे यहां तक कि बुखारा के मशहूर दीनी मदरसों में पहुंचकर आने फिक्ह हदीस तफ्सीर और दूसरे अक्ली इल्म की किताबे पढ़ी और मौलाना हुसामुद्दीन बुखारी र0 अ0 जैसी मशहूर हसितयों आडैर दूसरे बालिमों से आपने इल्म हासिल किया। आखिरकार मौलाना हुसामुद्दीन बुखाी र0अ0 ने आपको दस्तारे फजीलत अता फरमाई और इल्मे दीन से इतना मालामाल कर दिया कि आपकी गिनती उस वक्त के मशहूर आलिमों में होने लगी। फिर भी इल्म की प्यास बाकी रही और आप मौलाना हुसामुद्दीन बुखारी र0 अ0 से रूख्सत होकर समरकन्द चले गये, समरकन्द में भी दीनी तालीम के एक मदरसे में पहंुचकर और अधिक इल्म हासिल किया।

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